मुंबई कपल का तलाक रद्द, कोर्ट ने पत्नी के अधिकारों को किया सुरक्षित
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने वैवाहिक संबंधों और महिलाओं के अधिकारों के पक्ष में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी घर के कामकाज करने से इनकार करती है, तो इसे मानसिक क्रूरता की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने जोर देकर कहा कि विवाह दो व्यक्तियों के बीच एक सम्मानजनक और समान भागीदारी का संबंध है, न कि कोई ऐसा कानूनी अनुबंध जिसमें पत्नी से केवल सेवा की अपेक्षा की जाए। उच्च न्यायालय ने इस टिप्पणी के साथ ही 16 साल पुराने उस फैमिली कोर्ट के आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसने कामकाज न करने को क्रूरता मानते हुए पति के पक्ष में तलाक की डिक्री जारी की थी।
वैवाहिक जीवन समानता का आधार न कि सेवा का अनुबंध
अदालत ने अपने फैसले में इस बात को रेखांकित किया कि आधुनिक समाज में पत्नियों के साथ घरेलू सहायकों जैसा व्यवहार करना पूरी तरह अनुचित है। जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने कहा कि शादी के बाद किसी महिला से केवल खाना बनाने और साफ-सफाई की उम्मीद करना उसकी गरिमा के विरुद्ध है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घर के कामों में हाथ न बंटाना या उसे न करना सामान्य वैवाहिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन इन्हें कानून की नजर में इतना गंभीर अपराध नहीं माना जा सकता कि उसके आधार पर किसी पवित्र वैवाहिक रिश्ते को खत्म कर दिया जाए।
फैमिली कोर्ट के पुराने फैसले पर हाई कोर्ट का प्रहार
उच्च न्यायालय ने मुंबई की फैमिली कोर्ट द्वारा जुलाई 2010 में दिए गए तलाक के आदेश को अन्यायपूर्ण बताते हुए रद्द कर दिया। कोर्ट ने न केवल शादी को बरकरार रखा, बल्कि पति को यह निर्देश भी दिया कि वह अपनी पत्नी को समाज में सम्मानजनक जीवन जीने में सहायता प्रदान करे। इसके लिए पति को प्रतिमाह 10,000 रुपये गुजारा भत्ता और रहने के लिए 10,000 रुपये घर के किराए के तौर पर देने का आदेश जारी किया गया है। जजों ने माना कि निचली अदालत ने आरोपों की गंभीरता को परखे बिना ही फैसला सुना दिया था, जिसे किसी भी स्थिति में कायम नहीं रखा जा सकता।
मानसिक क्रूरता की परिभाषा और सामान्य घरेलू विवाद
खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान यह पाया कि पति द्वारा लगाए गए आरोप जैसे कि पत्नी का खाना न बनाना या माता-पिता की बात न मानना, वैवाहिक जीवन में होने वाले बेहद आम विवाद हैं। कोर्ट के अनुसार, मानसिक क्रूरता का अर्थ ऐसे व्यवहार से होता है जो साथी को असहनीय भावनात्मक पीड़ा या अपमान पहुंचाए, और यह दंपति के साथ रहने को असंभव बना दे। चूंकि यह जोड़ा शादी के बाद महज तीन महीने ही साथ रहा था, इसलिए इतनी कम अवधि के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि उनके बीच क्रूरता इस स्तर तक पहुंच गई थी कि तलाक ही एकमात्र रास्ता बचा था।

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