मोतिहारी|जब केंद्र सरकार ने मनरेगा की जगह जी राम जी योजना लाने की बात की तो 'अमर उजाला' ने बिल्कुल अंतिम छोर पर इस योजना की हकीकत समझने का प्रयास किया। कई तरह की बातें हर जिले से निकलीं, लेकिन कागजातों के साथ हमें पूरा खेल नेपाल से सटे पूर्वी चंपारण में जाकर मिला। पूर्वी चंपारण के एक पंचायत में कैसे मुखिया ने अपने मायके वालों के नाम जॉब कॉर्ड बनवाया, यह की पिछली खबर में सामने लाया गया था। अब भ्रष्टाचार की दूसरी और बड़ी हकीकत कि कैसे इस फंड का बंदरबांट किया जाता है? कैसे बगैर काम हुए, उसे पूरा दिखाया जाता है और इसी बहाने दूसरे के नाम से जारी पैसा भ्रष्टाचार के खिलाड़ियों की जेब में लौट आता है? 

यह एक उदाहरण, सिर्फ इन्हें नहीं पकड़िए

हम जिस खबर को सामने ला रहे, वह महज एक उदाहरण है। पहली खबर के साथ ही प्रशासन एक्टिव हुआ। जांच शुरू हुई। बड़े अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए। लेकिन, यह तो महज एक उदाहरण है। ऐसे हर जिले में मिलेंगे। एक नहीं, कई। क्योंकि, मनरेगा में भ्रष्टाचार का एक ही पैटर्न की जानकारी हर जिले से सामने आ रही है। 

कहां का है यह मामला, क्या मानी गई गलती?

मोतिहारी से 50 किलोमीटर दूर भारत-नेपाल सीमा पर बसे पूर्वी चंपारण जिले के घोड़ासहन प्रखंड के बिजई (विजयी) पंचायत का यह मामला है। भ्रष्टाचार का प्रमाण ही पहले देख लें'' प्रतिनिधि ने पड़ताल करते हुए मनरेगा कार्यालय में बिजई पंचायत रोजगार सेवक से सीधा सवाल किया तो उन्होंने भी ज्यादा समय नहीं लगाया और गलती स्वीकार करते हुए बताया कि पंचायत के मुखिया के दबाव में जल्दबाजी कर 'इन लोगों' (मुखिया के मायके वालों) का जॉब कार्ड बन गया था। ऑफिस के डाटा ऑपरेटर के साथ मिलकर ऐसा किया गया, लगता है। इन सभी से सरकारी फंड की रिकवरी करा ली गई है। मनरेगा के पीओ से सवाल किया तो उन्होंने बताया कि यह उनके आने के पहले की घटना है। पूर्वी चंपारण के उप विकास आयुक्त ने  की पहली खबर के बाद मंगलवार को खुद पंचायत और प्रखंड में जाकर हालत देखी, कागजात देखे। डीडीसी ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह भारी गबन का मामला है। अभी यह जांच और चलेगी। सभी संबंधित लोगों पर कार्रवाई की जाएगी

मौके पर चुप्पी, मगर खेल की पूरी समझ भी यहीं मिली

पंचायत के कुछ लोगों ने कैमरे पर तो कुछ भी बोलने के मना कर दिया, लेकिन भ्रष्टाचार के पूरे खेल को कुछ उदाहरण वाले नामों की जानकारी देते हुए समझाया। पता चला कि कई लोगों का केवल जॉब कार्ड खोलकर पैसे का उठाव होता रहा है। जो यहां नहीं रहते, उनके नाम पर भी। जो दूसरा काम कर रहे, उनके नाम पर भी। मनरेगा के काम की राशि उन खातों में जाती है और फिर 300 से 500 रुपए वापस ले लिया जाता है। भरोसेमंद लोगों के नाम पर ही जॉब कार्ड बनवाया जाता है। आम तौर पर एक योजना के काम में चार-पांच मजदूर ही रखे जाते हैं और बाकी काम जेसीबी मशीन से करवा लिया जाता है। जांच हो तो सामने आएगा कि वही चुनिंदा चेहरे हर काम में दिखेंगे, जब जियो टैगिंग के लिए तस्वीर ली जाती है।